क्या सरकारी अस्पताल अब इलाज के केंद्र नहीं, बल्कि दलालों की मंडी बन चुके हैं? उत्तराखंड के रुड़की से एक ऐसी खबर सामने आ रही है जो स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा रही है। यहाँ रात के अंधेरे में मानवता शर्मसार हो रही है। जब गरीब मरीज उम्मीद लेकर अस्पताल पहुँचता है, तो डॉक्टर नहीं, बल्कि ‘दलाल’ उसका स्वागत करते हैं। और खेल शुरू होता है—जिंदगी और मौत के सौदेबाजी का।रुड़की के सरकारी अस्पताल में इन दिनों सफेद कोट के पीछे काले धंधे का बोलबाला है। सूत्रों की मानें तो अस्पताल के कुछ डॉक्टरों और स्टाफ की मिलीभगत से यहाँ ‘दलाली का सिंडिकेट’ चल रहा है। जैसे ही कोई गंभीर मरीज अस्पताल आता है, उसे डराया जाता है, सुविधाओं का अभाव बताया जाता है और फिर शुरू होता है ‘रेफर’ करने का खेल। अस्पताल से रेफर होते ही ये दलाल गिद्धों की तरह मरीज को दबोच लेते हैं। एम्बुलेंस के जरिए मरीज को सरकारी अस्पताल से सीधे उन निजी ‘फर्जी’ अस्पतालों में पहुँचाया जाता है, जो शहर में कुकरमुत्तों की तरह उग आए हैं। इन अस्पतालों के पास न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं, न ही जरूरी संसाधन। यहाँ मरीज का इलाज नहीं, बल्कि उसकी जेब और जिंदगी से खिलवाड़ होता है।
रात के अंधेरे में सरकारी अस्पताल में दलाल कैसे बेखौफ घूम रहे हैं?
क्या स्वास्थ्य विभाग को इन बिना मानक वाले फर्जी अस्पतालों की खबर नहीं है?
आखिर क्यों इन ‘मौत की दुकानों’ पर विभाग मेहरबान है?
क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
नवनियुक्त CMS डॉ. ए.के. मिश्रा ने जिम्मेदारी संभालते ही सख्त तेवर दिखाए हैं। उन्होंने 1 जनवरी से कार्यभार ग्रहण करने के बाद दलालों को चेतावनी दी है और निजी एम्बुलेंस के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि: क्या ये आदेश फाइलों से बाहर निकल पाएंगे? हकीकत यह है कि दलाल इतने बेखौफ हैं कि वे अस्पताल के अंदरूनी ‘लालची संपर्कों’ के दम पर दिन-दहाड़े अपना नेटवर्क चला रहे हैं। रुड़की की ये तस्वीर डराने वाली है एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करती है, तो दूसरी तरफ दलालों का यह मकड़जाल उन दावों को निगल रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या हरिद्वार स्वास्थ्य विभाग कुंभकर्णी नींद से जागेगा या फिर गरीब मरीज इसी तरह इन फर्जी अस्पतालों की बलि चढ़ते रहेंगे।

